दर्द कितनी रात लेकर ,अधजगी -सी भोर लेकर ,
अधखिले से फूल लेकर, आंसुओं की ओस लेकर,
चहचहाता जा रहा है, पक्षियों के साथ उड़कर,
कुछ हवा भीगी हुई है,कुछ जमीं गीली हुई है,
रेत से तपते बदन पर, प्यार की बारिश हुई है,
कर रहा शीतल जगत को ,बादलों का लेप लेकर ,
दर्द जीना चाहता है, दर्द मरना चाहता है,
यह तुम्हारा हाल तुमसे ,सिर्फ सुनना चाहता है,
पनघटों पर है भटकता ,अधबुझी- सी प्यास लेकर,
तुम कहाँ हो, मैं कहाँ हूँ,तुम जहाँ हो मैं वहाँ हूँ,
दर्द की इन सरहदों पर, तुम खड़ी हो, मैं खड़ा हूँ,
सृष्टि की सम्पूर्णता में ,यह खिला जलजात लेकर/
बुधवार, 15 जून 2011
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